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शुक्रवार, २९ मे, २००९

श्री वेङ्कटेश करावलम्ब स्तोत्रम्

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श्री शेषशैल सुनिकेतन दिव्यमूर्ते नारायणाच्युत हरे नलिनायताक्ष |
लीलाकटाक्ष परिरक्षित सर्वलोक श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || १||

ब्रह्मादिवन्दितपदाम्बुज शङ्खपाणे श्रीमत्सुदर्शन सुशोभित दिव्यहस्त |
कारुण्यसागर शरण्य सुपुण्यमूर्ते श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || २||

वेदान्त- वेद्य भवसागर- कर्णधार श्रीपद्मनाभ कमलार्चितपादपद्म |
लोकैक- पावन परात्पर पापहारिन् श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || ३||

लक्ष्मीपते निगमलक्ष्य निजस्वरूप कामादिदोष परिहारक बोधदायिन् |
दैत्यादिमर्दन जनार्दन वासुदेव श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || ४||

तापत्रयं हर विभो रभसा मुरारे संरक्ष मां करुणया सरसीरुहाक्ष |
मच्छिष्यमित्यनुदिनं परिरक्ष विष्णो श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || ५||

श्री जातरूपनवरत्न लसत्किरीट- कस्तूरिकातिलकशोभिललाटदेश |
राकेन्दुबिम्ब वदनाम्बुज वारिजाक्ष श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || ६||

वन्दारुलोक- वरदान- वचोविलास रत्नाढ्यहार परिशोभित कम्बुकण्ठ |
केयूररत्न सुविभासि- दिगन्तराल श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || ७||

दिव्याङ्गदाङ्कित भुजद्वय मङ्गलात्मन् केयूरभूषण सुशोभित दीर्घबाहो |
नागेन्द्र- कङ्कण करद्वय कामदायिन् श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || ८||

स्वामिन् जगद्धरणवारिधिमध्यमग्न मामुद्धारय कृपया करुणापयोधे |
लक्ष्मींश्च देहि मम धर्म समृद्धिहेतुं श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || ९||

दिव्याङ्गरागपरिचर्चित कोमलाङ्ग पीताम्बरावृततनो तरुणार्क भास
सत्यांच नाभ परिधान सुपत्तु बन्ध श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || १०||

रत्नाढ्यदाम सुनिबद्ध- कटि- प्रदेश माणिक्यदर्पण सुसन्निभ जानुदेश |
जङ्घाद्वयेन परिमोहित सर्वलोक श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || ११||

लोकैकपावन- सरित्परिशोभिताङ्घ्रे त्वत्पाददर्शन दिने च ममाघमीश |
हार्दं तमश्च सकलं लयमाप भूमन् श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || १२||

कामादि- वैरि- निवहोच्युत मे प्रयातः दारिद्र्यमप्यपगतं सकलं दयालो |
दीनं च मां समवलोक्य दयार्द्र दृष्ट्या श्री वेङ्कटेश मम देहि करावलम्बम् || १३||

श्री वेङ्कटेश पदपङ्कज षट्पदेन श्रीमन्नृसिंहयतिना रचितं जगत्याम् |
ये तत्पठन्ति मनुजाः पुरुषोत्तमस्य ते प्राप्नुवन्ति परमां पदवीं मुरारेः || १४||

|| इति श्री शृङ्गेरि जगद्गुरुणा श्री नृसिंह भारति स्वामि

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